Wednesday, December 28, 2022

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न कानून "इसे भी जाने"

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013
 आज हम महिलाओं को एक साथ लेकर चलने की बात करते हैं और महिलाओं और लड़कियों को जब भी अवसर मिलें हैं उन्होंने यह साबित किया है कि अगर अवसर मिले तो वह किसी से कम नहीं हैं और आज की नारी और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं है कोई ऐसा काम नहीं है जो एक महिला और पुरुष में भेद पैदा करता हो और वह अब आधुनिक भाग दौड़ भरी जिंदगी का एक अहम पहलू हैं इसी के मध्यनजर हम यह भी जानते है की आजकल महिलाएं और लडकियाँ खुद के पैरों पर खड़ी है वह विभिन्न जगहों पर काम करती हैं चाहे वह गाँव हो या शहर हो वह भी अब अपने परिवार और अपने भरण पोषण के लिए नौकरी कर रही है और ऐसे में बात आती है महिलाओं  कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर, कई बार लोगों को पता नहीं होता है की ऐसा भी कोई कानून है जो सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के लिए ही है जो उनको कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान करता है, कभी कभी जानकारी न होने के कारण वह अपने उपर हो रहे शोषण को सहती रहती हैं जिससे उनके स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. घर हो या सड़क खेत हो या खेल का मैदान, कालेज हो या स्कूल महिलाओं के साथ हिंसा की कोई वजह नही होती है, यह हिंसा न केवल उनके अस्तित्व को चोट पहुचाती है बल्कि उनके सेहत उनके मनोबल को भी चोट पहुचाती है, हिंसा के रूप में यौन हिंसा करना भी उत्पीडन है चाहे वह कार्यस्थल पर ही क्यों न हो रहा हो.
सन् 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम को पारित किया गया था।जिन संस्थाओं में दस से अधिक लोग काम करते हैं उन पर यह अधिनियम लागू होता है  ये अधिनियम 9 दिसम्बर, 2013 में प्रभाव में आया था। जैसा कि इसका नाम ही इसके उद्देश्य रोकथाम  निषेध और निवारण को स्पष्ट करता है और उल्लंघन के मामले में, पीड़ित को निवारण प्रदान करने के लिये भी ये कार्य करता है।
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कार्यस्थल पर होने वाले कुछ अवन्छिक व्यव्हार यौन उत्पीडन कहलाते है – जैसे – अनचाहे स्पर्श, गले लगना, लिपटना या चूमना, घूरना, ताकना, सिटी बजाना, आंख मारना, अश्लील हरकतें जैसे जान भूझकर चिपकना, गुप्तांगों को सहलाना, होठों पर जीभ फेरना, ऑंखें तरेरना, नोचना, चिकोटी काटना. यौन अर्थ वाले शब्द कमेन्ट, गाली, किसी भी तरह की यौनिक मंशा के साथ की गई जबरदस्ती इस हिंसा के दायरे में आती है – इसके लिए हर कार्यस्थल पर एक कमेटी बनी होती है जिसकी शिकायत आप वहां कर सकते हों और अगर कोई ऐसा व्यक्ति इसमें संलिप्त पाया गया जो इस कमेटी में है तो वह उस कमेटी से निकल दिया जायेगा और उसकी जगह कोई जब तक नहीं आ जाता तब तक निर्णय नहीं होगा या फिर जिलाधिकारी को भी इसकी शिकायत की जा सकती है और इसमें महिला मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं का भी सहारा लिया जा सकता है नही तो सीधे पुलिस से भी  सकी सहायता ली जा सकती है अगर कोई महिला इसका शिकायत करना चाहती है तो यह शिकायत लिखित में होनी चाहिए 

आपके लिये यह जानना बेहद जरूरी है कि इस संबंध में नीतियां ;पोलिसीद्ध क्या कहती हैं। ताकि आप उसके अनुसार तैयारी कर पाएं। साथ ही अपने कानूनी अधिकारों को जानें। इससे संबंधिक कानूनों को पढ़ें या किसी कानूनी जानकार से विकल्पों के बारे में जानकारी लें।
सबसे पहला कदम ये उठाएं उत्पीड़न के मामले में जो सबसे पहला कदम उठाना चाहिये वो ये है किए आप सीधा जाकर उस व्यक्ति से बात करें जो आपको परेशान कर रहा है। और उसे इस बात का अंदेशा दें कि आप बर्दाश्त करने वाले या चुप रहने वालों में से नहीं हैं। उसे इस संबंध में एक लिखित चेतावनी भी दें। यदि उससे बात कर कोई फायदा न होए तो अपने सानियर से इसकी शिकायद करें। अपने एचआर ;ह्यूमन रीसोर्सद्ध मैनेजर को भी इसमें शामिल करेंए ताकि वे आपको आगे की कार्रवाई के बारे में सूचित कर सकें। इस मामले को अब लिखित बनाएं।
पीड़ितों और गवाहों को जुटाएं इस बात की पूरा संभावना है किए आपको परेशान कर रहे व्यक्ति ने पहले भी लोगों के साथ उत्पीड़न किया होए या वो हाल में भी और लोगों के साथ ऐसा करता या करती हो। उन लोगों से बात करें और उन्हें एक साथ जुटाने की कोशिश करें। अपने लिये किसी प्रत्यक्ष गवाह को तैयार करने की कोशिश करें। जितने हो सके सबूत जुटाएं। बाकी पीड़ितों से भी लिखित सूचना या चेतावनी देने का आग्रह करें ताकि आप सभी का केस मजबूत बन पाए। इसके बाद सीनियर मैनेजमेंट से इस संबंध में बात करें। उनके सामने सभी संभव सबूत ले जाएं। उत्पीड़न करने वाले के खिलाफ मुकदमा करें
अपने विकल्पों का मूल्यांकन करने के लिए वकील से सलाह लें। स्पष्ट रहें और सुनिश्चित कर लें कि आप बदले में क्या चाहते हैं जैसे मुआवजा या अगर आपको नौकरी से निकाल दिया गया होए तो अपनी नौकरी में वापसी।

      Friday, May 20, 2022

      जेंडर और सेक्स क्या है ?

      मैं समाजिक पिछले कुछ सालों से सामाजिक क्षेत्र से जुड़ा हूँ जहाँ मुझे महिलाओं, पुरुषों, किशोर - किशोरियों और बच्चो के साथ काम करने का अनुभव हुआ है, मुझे लगा की कुछ प्राथमिक जानकारियां जो की बेसिक हैं क्यों न उनपर कुछ लिखा जाय मेरा लिखना भी हो जायेगा क्युकी इंटरनेट पर जानकारियां तो बहुत हैं लेकिन हमको जो चाहिए वह नहीं बहुत ज्यादा जानकारियां है मुझे लगा कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखने से सामाजिक दिशा में चल रहे प्रयासों की तरफ एक कदम भी बढ़ेगा. जिस तरह से मैं शोषित तथा वंचित समुदाय को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए कार्यरत हूँ जिसमें कुछ विषय हैं जो बहुत ही छोटे लगते हैं लेकिन हमारी जिंदगी में बहुत अहमियत रखते हैं जैसे – महिला स्वास्थ्य, जेंडर, समता- समानता, SRHR को लेकर कुछ अहम् जानकारियों को लिखने का प्रयास करता रहूँगा. आने वाले समय में मैं इन विषयों पर और फेमिनिस्ट मुद्दों पत भी लिखने का प्रयास करूंगा.

      जेंडर और सेक्स में क्या अंतर होता है ?
      जेंडर एक सामाजिक विचार धारा है और जेंडर इंसानों द्वारा बनाया गया है जेंडर में पर्रिवर्तन हो सकता है, जेंडर स्थान के बदलने के  साथ बदलता रहता है, जेंडर सार्वभौमिक नहीं होता है.

      सेक्स क्या होता है ?

      सेक्स जैविक होता है. यह प्रकृति द्वारा प्राप्त होता है सेक्स में इंसानों के जननांगो में विभिन्नताए पाई जाती है जैसे स्तन , योनी , शिश्न . महिला और पुरुष को अलग बनाते है और लिंग को बदला नही जा सकता हाँ आजकल विज्ञानं की सहायता से इसको बदला जा सकता है लेकिन अगर विज्ञानं का सहारा न लिया जाय तो इसको बदला नहीं जा सकता है. सेक्स को बदला नही जा सकता 

      इसको एक उदहारण से अगर समझना हो तो हम ऐसे देख सकते हैं –

      क्या पुरूषों द्वारा किसी नवजात शिशु को दूध पिलाया जा सकता है? आपके मन में क्या आया ?

      नहीं ......   यही आपके मन में आया न.. ये हैं जेंडर क्युकी यह धारणा हमारे मन में इसलिए है क्युकी हम सोचते है की पुरुष ऐसा कोई काम नहीं कर सकता है -

      हाँ पुरुष शिशु को दूध पिला सकता है लेकिन स्तन पान नहीं करा सकता है इसमें शिशु को दूध तो कोई भी पिला सकता है बोतल से लेकिन स्तन पान सिर्फ महिला करा सकती है तो इसमें हमारी धारणा बन चुकी होती है की पुरुष बच्चो को नहीं सम्भाल सकते यह जेंडर है और स्तन पान करवाना जैविक है इसलिए वह सेक्स कहलाता है.
      समुदाय में हम इस तरह के भी उदहारण को पेश कर सकते हैं .


      किस तरह से हमारे समाज और परिवार में जेंडर आधारित हिंसा या भेदभाव देखने को मिलता है   जैसे लडको को कही भी आने जाने की आज़ादी होती है लेकिन लड़कियां अपनी मर्ज़ी से कही आ जा नहीं सकती है , लड़के शहर जाकर पढ़ सकते हैं लेकिन लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से पढने की आज़ादी नही और कही बाहर जाकर पढने नही दिया जाता है, लड़कियों को घूंघट में रहना पड़ता है लेकिन लडके कुछ भी पहन सकते है लडको को निर्णय लेने का अधिकार होता है लेकिन घर में लड़कियों को निर्णय लेने का कोई अधिकार नही दिया जाता है , लडकियों से ज्यादा काम करवाया जाता है 

                                                                                                                                                                    

        धन्यवाद 

      Thursday, March 22, 2018

      जल दिवस और जल संकट

       मानव जीवन के लिए सबसे उपयोगी और महत्वपूर्ण है "जल"। आपने यह तो सुना ही होगा कि "जल ही जीवन है" , लेकिन इस बात पर कभी गंभीरता से विचार किया है की आने वाले समय में जल संकट एक गम्भीर समस्या बनने वाली है। यह मैं इसलिए सचेत करवा रहा हूँ क्योंकि आज विश्व जल दिवस है । और यह पहली बार 1993 में मनाया गया था। सिर्फ जल दिवस मनाना ही समस्या का समाधान नहीं है हमें मिलकर जल संरक्षण का कार्य भी करना होगा ।  हमारी जिंदगी का मुख्य केंद्र पानी है लेकिन हम अपनी योजनाओं में इस केंद्र बिंदु पर ध्यान केन्द्रित ही नहीं कर रहे हैं जबकि हम तेजी से विकसित हो रहे हैं।







       जल संकट 


      गाँवों तथा शहरों में दिन प्रतिदिन पेयजल का संकट गहराता जा रहा है । इसके पीछे कारण पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो अथवा बढ़ती जनसंख्या या वर्षा जल संचयन का अभाव । एक मुख्य कारण जल संकट का यह भी हो सकता है की भारत में वर्षा कुछ माह तक ही सीमित है और वह भी अनिश्चित है ।




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      भारत की गिनती आफ्रिका ,आस्ट्रेलिया उत्तरी अमरीका जैसे 26 ऐसे देशो मे की जाती है जहाँ पानी की कमी है । आज देश के 50% जिले पपनी की दृष्टि से सूखे क्षेत्रों की श्रेणी मे आते हैं । राजस्थान बिहार , उत्तर प्रदेश ,कर्नाटक ,आन्ध्र प्रदेश के अधिकांश जिले बराबर सूखे की चपेट मे आते रहते हैं ।  मध्य प्रदेश ,दिल्ली ,गुजरात मे यहाँ तक की केरल में भी जहाँ की जल की विपुल सम्भावनाएं  हैं । लोगो को स्वछ जल उपलब्ध नही हैं एक अनुमान के अनुसार 15 राज्यो मे भूजल स्तर 5 से 7 प्रतिशत की दर पर प्रतिवर्ष गिर रहा है , जबकि भारत की 80% आबादी स्वछ जल हेतु भूजल पर निर्भर है ।


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      पेयजल की समस्या के साथ ही प्रदूषित जल की समस्या भी विकट है । आज देश में लगभग 22 नदियाँ प्रदूषण की शिकार हैं । विश्व जल आयोग ने गंगा नदी को विश्व की 7 प्रदूषित नदियो मे से एक माना है । रही कसर तेज़ी से बढ़ते औध्योगिकीकरण पर्यटको का बढ़ता दबाव नदियों बांधों और तालाबों मे गंदगी जमा होने से उत्पन्न प्रदूषण पूरी कर दी है । पानी की गुणवत्ता मे गिरावट से फ़्लोरोसिस ,पीलिया ,पेट तथा चमड़ी रोग , कैंसर जैसी बीमारियाँ पैदा हो रही हैं । विश्व स्वस्थ संगठन का आकलन है की विश्व के पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौत जल जनित बीमारियो से हो रही है ।



      इसलिए आज समय की मांग है की जल संकट के संधानों पर काम किया जाय । पानी का विवेक सम्मत तरीके से उपयोग किया जाय और भूजल के रिचार्ज और डिस्चार्ज मे संतुलन स्थापित किया जाय । 
      भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई और ड्रिप जैसी वैज्ञानिक टकनिके विकसित कर्णी चाहिए ।  सरकार के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति को जल संरक्षण को राष्ट्र सेवा मानते हुये अपना 100 प्रतिशत देना होगा ।  


      देश भर मे जल सिक्षा की औपचारिक तथा अनौपचारिक  शिक्षा  पर ध्यान देना होगा जल नीतियाँ तैयार करनि होंगी । देश की सभी नदियो को आपस मे जोड़ देना चाहिए । नदियों का ये जुड़ाव सिर्फ बाढ़ और  सूखे से निजाद नही दिलाएगा बल्कि इससे संचित क्षेत्रफल बढ़ेगा , एक नदी  का अतिरिक्त पानी दूसरी नदी मे भेज कर जरूरत के मुताबिक अन्य इलाकों में पहुंचाया जा सकता है , बिजली का उत्पादन बढ़ाने मे मदद मिल सकती है और पेयजल की सहज उपलब्धता सुनिश्चित हो सकती है ।



      जल के संबंध मे हमारा ध्यान मुख्य रूप से तीन बातों पर केन्द्रित होना चाहिए – जल की उपलब्धता , उसकी गुणवत्ता तथा आम लोगो तक उसकी निरबाध्य पहुँच । कहना न होगा की हमारे ढांचागत विकास की शर्तो मे भी जल की उपलब्धता जहाँ एक एक अनिवार्य शर्त है , वहीं नदियो के किनारे अपनी सभ्यताओं ने भी यह प्रमादित किया है की सामाजिक और आर्थिक विकास के नज़रिये से भी पानी भूत बड़ी पूंजी है ।






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      जल की कमी किस वजह से हो रही है शायद ही कोई जिसको यह न पता हो।  अगर समय रहते पानी को नहीं बचाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम पानी की एक बूँद देखने के लिए तरसेंगे। इसलिए सभी को अपने अपने तरीके से पानी को बचाना होगा।  क्योंकि "जल है तो ही जीवन है"। 






      Thursday, October 20, 2016

      इस दीपावली


      जी दीपावली का नाम आते ही जेहन में दीप और पटाखों का ख्याल मन में आने लगता है। और आये भी क्यों न आखिर दिवाली है ही दीपों का त्यौहार इसी लिए तो मनाया जाता है अब आप लोगों को ये बताने की जरुरत मैं नहीं समझता की दिवाली क्यों मनाई जाती है क्योंकि हमको बचपन से ही इसके बारे में बताया जाता रहा है वैसे मैं संक्षेप में बता ही देता हूँ की रावण का वध करने के बाद और 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्री राम अयोध्या पहुँचे तो वहा की जनता अपने राजा के स्वागत में घी के दिए जलाये और उनका स्वागत किया ।


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      पहले की दिवाली और आज की दिवाली में कितना बदलाव नज़र आ गया है ये अगर आप खुद ही एक बार दिल से सोचे तो पता लग जायेगा । दिवाली पे लोग अपने घर दुकान और आसपास साफ-सफाई और रंगाई पुताई करवाते है । क्या आपको पता है कि दिवाली भारत ही नहीं अपितु दूसरे देशों में भी मनाया जाता है दीवाली नेपाल, श्रीलंका, म्यामांर, मॉरीशस,गुयाना, मलेशिया, सिंगापुर,फिजी, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया की बाहरी सीमा पर क्रिसमस डीप और भी देशों में  दिवाली पर एक सरकारी अवकाश है।


      इस दिवाली मैं कुछ खास आग्रह करने वाला हूँ जी हाँ मैं इन दिवाली उन लोगों से बात करना चाहता हूँ जो सर्जिकल स्ट्राइक और देश भक्ति फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से दिखाते है क्योंकि अब वो समय आ गया है जब देश भक्ति में कुछ करके दिखाया जाय । दोस्तों सभी जानते है कि पाकिस्तान को चीन की सह प्राप्त है यानि चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है और दिवाली आते ही भारतीय बाज़ारों में रौनक दिखाई देने लगती है लेकिन आपको नहीं लगता कि ये रौनक चाइनीज सामानों से भरी होती है । क्यूँ न इस दिवाली हम अपने सेना को जवानों को सच्ची श्रद्धांजलि दे और हर भारत वासी को इस बार चाइना का कोई भी सामान नहीं खरीदने की सलाह दें , क्योंकि चाइना भारत से व्यापार करके आर्थिक रूप से काफी मुनाफा होता है या तो ये कह ले की हम अपने दुश्मनों का सामान क्यों लें । जी हां इस दिवाली चाइनीज झालर लाइट और मोमबत्तियों का बहिष्कार होना चाहिए जिससे चीन को अपनी औकात पता चल जाय ।


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      इस दिवाली को मिट्टी के दिये ख़रीदे जिससे किसी गरीब की मदद हो जो इस दिए को बना के बेचते है क्या पता उस गरीब का कुछ फायदा ही हो जाय और तेल का दिया जलाये, जिससे वातावरण भी शुद्ध होगा और चाइनीज सामानों को भी बढ़ावा नही मिलेगा । दोस्तों पिछली दिवाली को प्रधान मंत्री ने भी मिट्टी के दिए जलाने का आग्रह किया था जिसपे बहुत से लोगों ने अमल भी किया था । लेकिन इस बार कोई भी बहाना न करिये और स्वदेशी चीजों का इस्तेमाल करिये । अपने देश के प्रति अपनी भागीदारी को समझीये । अगर आपने अपनी दिवाली की खरीदारी कर ली है तो कोई नही लेकिन आगे से चाइनीज समानो का बहिष्कार करिये ।
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      यहां तक की बाज़ारों में चाइनीज दिये और लक्ष्मी गणेश भगवान की मूर्ति भी चाइनीज आ रहीं है अपने देश की कला को पहचानिये अगर अब नही जागेंगे तो कब जागेंगे ? अनजाने में ही सही आप दुश्मनों की मदद करते है । क्योंकि जो गोली हमारे देश के जवानों को लगती है इन्ही पैसों से आती है चीन हमारे ही दम पर हमें ही आँख दिखाता है । हमारे भारत के बाज़ारों में चीन ने काफी अच्छी पकड़ बना ली है। इस पकड़ को कमज़ोर करना है इस दिवाली निकलेगा चाइनीज सामानों का दिवाला । इस बार कुछ कर दिखाना है । पुतले और कैंडल मार्च तो बहुत निकाल लिए अब कुछ कर दिखाने का समय है इसको नष्ट न करे और अपने आस पड़ोस बच्चों बड़ो जो भी ये लेख पढ़े सभी से विनम्र आग्रह है कि अपने देश को आगे बढ़ाने में मदद करें ।
      और इस दिवाली स्वदेशी दिवाली मनाइये देखिये उन लाइटों से ज्यादा आनंद दिये में आयेगा ।
      दिवाली ही नही बल्कि हमेशा के लिए चाइनीज चीजों का बहिष्कार होना चाहिए इसकी शुरुआत इस दिवाली से करना है दोस्तों । दूसरों को भी इसके बारे में जानकारी देते रहे और भारतीय होने का फ़र्ज़ निभाएं।
      शुभ दिवाली और सुरक्षित दिवाली सभी को दिवाली की हार्दिक शुभ कामनाएं ।

      Friday, October 7, 2016

      सर्जिकल स्ट्राइक

      भारत माता की जय जी हाँ हमारी सेना ने जो काम किया है उसके लिये तो सिर्फ यही कहना है सभी भारत वासी का मैं बात कर रहा भारत के द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक का जिसमें सेना के जवानों के जज्बे को सलाम । सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पहली बार भारत में सभी राजनितिक पार्टिया सेना के साथ दिखी और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब के लिए सेना को बधाइयां दी । लेकिन जब कुछ राजनीतिक पार्टियों से ये नहीं देखा गया की सरकार की वाहवाही हो रही है या ये कह ले की वर्तमान पार्टी को कही कुछ फायदा तो नही हो रहा ।
      लेकिन अचानक से न जाने कहा चली गयी उन विपक्षी पार्टियों की देशभक्ति की वो सेना के जवानों पर ही संदेह कर बैठे की सर्जिकल स्ट्राइक हुआ भी है या नहीं अरे विपक्ष में रहने का या मतलब जरूर है कि वो वर्तमान सरकार का विरोध करें लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वो सेना और शहीदों पर भी राजनीती शुरू कर दें ।
      अरे जाकर कोई पूछे उन शहीदों के माँ बाप से जिन्होंने अपने बेटे और उस पत्नी ने जिसने अपना पति खोया हो और उस बच्चे पे क्या बीतेगी जिसने अपने पिता का साया खोया हो।
      उन भारत माँ के सपूतों को याद करने के बजाय ये बेवजह की बयान बाजी के इस दौर में हर पार्टी शामिल है । कोई भी इससे अछूता नही रहा है ।
      शर्म आनी चाहिए उन लोगों को एक तरफ जवान अपने जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करता है और दूसरी तरफ वो लोग जो अपने घर में सुरक्षित है बयान पे बयान दिए जा रहे ।
      कम से कम सेना को तो अपना काम सही ढंग से करने दिया जाय उनका हौसला अफजाई न कर सके तो उनके उस विश्वास और प्यार को टूटने भी न दिया जाय सोचिये उस जवान पे क्या गुजरेगी जो सरहद पे अपने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति लगा देते हैं ।
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      मैं किसी एक पार्टी या व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ नही कहना चाहूंगा क्योंकि देश की जनता देख रही है कि कौन क्या कह रहा है , किसी को कुछ बताने की जरुरत नही है ।
      हमारे देश की सीमा सुरक्षित है तभी हम चैन की नींद सो पा रहे है और उनके ही कार्य प्रणाली पे सवाल उठाना खुद चुल्लू भर पानी में डूब मरने जैसा है ।
      राजनीती का मतलब ही भूल गए है हमारे नेता की किस भाषा का प्रयोग करना चाहिए । कोई भी कुछ भी बोल देता है राजनेता तो छोड़िए कुछ अभिनेता भी इस मौके का फायदा उठाने में बाज़ नही आ रहे चाहे कभी सरहद पर जाकर ये देखने की कोशिश न की हो की कैसे सीमाओं को सुरक्षित रखते है ये जवान । लेकिन सबकी देश भक्ति सोशल मिडिया फेसबुक ट्विटर या किसी वीडियो से दिख रही है अरे मदद करनी ही है तो उन शहीदों को जाकर सच्चे दिल से श्रद्धांजलि दो ।
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      ये पहला ऐसा मौका होगा की देश के ही नेता अपने देश की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं दिख रहे । जनता को अब सोच समझकर ही अपना वोट देना होगा ।
      क्योंकि ये लोग खुद तो शर्मसार होते ही बल्कि देश का नाम भी खराब करते है दूसरे देशों में ऐसा लगता है ये अपने देश नही पड़ोसी देश की तरफ से चुनाव की तैयारियां कर रहे । मैं क्या कहना चाहता हूँ कुछ बुद्धिजीवी लोगों के समझ आ गयी होगी क्योंकि मैं किसी का नाम लेकर उन्ही लोगों की लिस्ट में नहीं शामिल होना चाहता । क्योंकि पाकिस्तान जैसे देश का साथ जब पूरी दुनिया नहीं दे रही तब ये राजनेता ऐसे बयान देकर एक चिंतनीय विषय स्थापित करते है ।
      आज एयर फोर्स डे है इस अवसर पर देश के वीरों को सत् सत् नमन करता हूँ। ऐसे ही वो दुश्मनों को मुह तोड़ जवाब देते रहे इसकी कामना करता हूँ।
      जय हिंद जय भारत

      Monday, August 29, 2016

      राष्ट्रिय खेल दिवस और मेजर ध्यान चंद


      आज राष्ट्रिय खेल दिवस है और क्या आपको पता है की भारत में राष्ट्रिय खेल दिवस 29 अगस्त को क्यों मनाया जाता है।क्योंकि 29 अगस्त के दिन ही हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद का जन्मदिन है । जी हाँ भारत के हॉकी के जादूगर का जन्म 29 अगस्त 1905 में इलाहबाद में हुआ था।




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      मेजर ध्यान चन्द को क्रिकेट में सर डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल में पेले के समतुल्य माना जाता है जैसे की हम सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते है वैसे ही मेजर ध्यान चंद को हम हॉकी का जादूगर कहते है।

      क्योंकि ध्यानचंद जब खेलते थे तो बॉल उनकी हॉकी से यू चिपक जाती थी जैसे चुम्बक में लोहा चिपक जाता हो। और यहां तक की उनकी हॉकी में चुम्बक होने की आशंका होने को लेकर उनकी हॉकी तक तोड़ के देखी गयी। और जब वो खलते थे तो दर्शक तो उनके मुरीद हो ही जाते थे बल्कि प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी भी उनके खेल के कायल हो जाते थे। उनके इस जादूगरी के बारे में न जाने कितने किस्से है जिनको बताने के लिए शब्द भी कम पड़ जायेंगे। यहां तक की एक बार उनके खेल की कलाकारी से मोहित होकर  जर्मनी के जिद्दी तानाशाह हिटलर ने उनको जर्मनी की तरफ से खेलने  की पेशकश की थी जिसको इस भारत के सपूत ने ठुकरा दिया था और भारत की तरफ से ही खेलने का फैसला किया था।





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      समय समय पर मेजर ध्यान चन्द का नाम सुर्ख़ियो में आता है वो भी इस बात को लेकर की उनको भारत रत्न दिया जायेगा लेकिन इतने वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक उनको भारत रत्न नही मिल पाया । आखिर क्यों है उनमे ये बात की भारत रत्न की पेशकश की जाती रही है उनके नाम पर तो मैं ये बता दूं की एक मेजर ध्यान चन्द ही है जो भारत को तीन बार ओलंपिक में हॉकी को स्वर्ण पदक दिलाया था । जी हाँ इसी खिलाड़ी की अगुआई में भारत ने 1928 में एम्सटरडम ओलंपिक फिर 1932 में लॉस एंजलिस और तीसरी बार बर्लिन ओलंपिक 1936 इन्हीं की कप्तानी में भारत को स्वर्ण पदक मिला । और ओलंपिक में 101 गोल और अंतर्राष्ट्रीय खेलों में 300 गोल दागे जिसे आज तक कोई तोड़ नही पाया है एम्सटरडम ओलंपिक में हॉकी मैच में 28 गोल किये गए जिसमे मेजर ध्यान चन्द के अकेले 11 गोल थे। मेजर ध्यान चंद सिंह को 1965 में भारत के तीसरे सबसे बड़े सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया । मेजर ध्यान चंद कैंसर जैसी बीमारी से ग्रसित होकर 1979 में दुनिया को अलविदा कह दिया।



      हमारे देश के वर्तमान प्रधान मंत्री ने अपने आकाशवाणी पे प्रसारित होने वाले कर्यक्रम मन की बात में इस बात का जिक्र भी किया था। भारत को तीन बार स्वर्ण दिलाने के बाद भी मेजर ध्यान चंद को भारत रत्न अभी तक नही मिल पाया है लेकिन एक बार फिर से उनको भारत रत्न देने की मांग तेज़ हो गयी है पुरे देश में ये मांग हो रही है की ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाना चाहिए । यहां तक की उनके नाम पे एक स्टेडियम भी है
      पिछली बार इनकी जगह सचिन तेंदुलकर को मिल गया था । देखना है अब क्या होता है देश को लगातार तीन बार स्वर्ण दिलाने के बाद भी वो इससे वंचित है ।
      आज खेल दिवस पर मेजर ध्यान चन्द को सत् सत् नमन। 

      Wednesday, May 11, 2016

      दहेज़ एक समस्या

      आज दहेज़ प्रथा हमारे समाज का एक ऐसा दीमक बन गया है जो समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। अगर घर में लड़की जन्म लेती है तो कुछ घरो में तो लोग उसकी परवरिश से ज्यादा चिंता उसकी शादी के दहेज़ के लिए करने लगते है । कुछ लोग तो सोचते है की बस कुछ ले दे के लड़की की शादी कर दो बस उनकी जिम्मेदारी ख़तम । और यही कारण है की आज दहेज़ हत्या दिन ब दिन बढ़ रही है । सरकार को इसके लिए कारगर कदम उठाने चाहिए क्योंकि महिलाओ पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाया जाय।


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      एक आंकड़े के अनुसार दहेज़ हत्याए पहले से कुछ ज्यादा ही बढ़ी है इसके अनुसार 2007 से  2011 के बिच काफी हद तक नए मामले सामने आये है। 2012 में 2833 दहेज हत्या के मामले सामने आये । जो की 2011 में 2618 थी,2013 में ये बढ़कर 10709 हो गयी।अगर औसतन बात करे तो हर एक घण्टे में एक महिला की दहेज़ को लेकर हत्या होती है । जो की बहुत ही शर्मिंदगी की बात है। समाज में काफी कुछ बदल गया लेकिन ये दहेज़ प्रथा न बदल पाये ।


      दहेज़ लेना या देना कानूनन अपराध है और इसके खिलाफ कार्यवाही भी होती है और अगर ऐसी कोई घटना हो तो उसकी शिकायत अवश्य कराये क्योंकि कभी कभी समाज के डर से बहुत सी महिलाये अपने साथ होने वाले दहेज़ उत्पीड़न को अपने परिवार या जानने वाले को नही बता पाती है और इसका फायदा  वो लोग उठाते है जो दहेज़ के भूखे होते है वो महिलाओ को मानसिक और शारीरिक रूप से कष्ट देते है जो की कानूनन अपराध है । महिलाओ के लिए सरकार द्वारा कई कारगर कदम उठाये जा रहे है । उसके बाद भी अगर ऐसी घटनाये होती है कितने शर्म की बात है लोग बदलाव की बात करते है लेकिन खुद को नही बदलते क्योंकि जब आप बदलेंगे तभी समाज बदलेगा।
      keep change

      Sunday, May 8, 2016

      MOTHER DAY

      आज मदर डे है और ये कोई बताने की बात नही है की माँ बच्चों के दिल में एक खास जगह रखती है। माता,माँ,मॉम,मम्मी नाम अनेक लेकिन रिश्ता और स्नेह एक ही है। मदर डे हर साल मई में दूसरे सफ्ताह के रविवार को मनाया जाता है। जिसको लोग अपनी अपनी तरह से मानते है। एक माँ 100 शिक्षको से ज्यादा ज्ञान अपने बच्चे को देती है और कहा जाता है की माँ ही बच्चे की प्रथम पाठशाला होती है। 


      (फ़ोटो इंटरनेट)

      माँ के किरदार को हमारे सिनेमा ने भी खूब सराहनीय ढंग से पेश किया है । समय समय पर ऐसी फिल्में आती है जिसमे माँ का किरदार काफी दमदार और भावनात्मक होता है । मदर इन्डिया से लेकर निल बटे सन्नाटा तक फिल्मो में माँ की एक अहम् भूमिका रही है 50-60 के दशक में माँ का किरदार फिल्मो में काफी महत्वपूर्ण रहता था और दिवार फ़िल्म का डाइलॉग "मेरे पास माँ है" आज भी लोगो के जहन में ज़िंदा है ।
















      (फ़ोटो इंटरनेट)
      माँ तो माँ ही होती है लेकिन समय के साथ साथ आजकल माँ ने आधुनिक माँ का रूप ले लिया है जो की अपने बच्चों की माँ के साथ एक अच्छी मित्र भी है । क्युकी जिस तरह से डिजिटलाइजेसन बढ़ा है माँ ने अपने बच्चों का साथ दिया है।
      क्योंकि जब कोई संकट आती है तो पहले माँ ही याद आती है और कहीं न कहीं इंसान की सफलता में उसकी माँ का अहम् रोल होता है।माँ ही हमे बचपन में अच्छे बुरे की पहचान बताती है और एक सही मार्गदर्शक का रूप निभाती है ।
      आप कितना भी अच्छा खाना खाते हो लेकिन माँ के हाथ के खाने की बात ही कुछ और होती है। यहाँ ये कहना गलत नही होगा की भगवान ने अपनी जगह माँ को हमारे बिच भेजा है। जीवन में सफलता पानी है तो अपनी माँ के द्वारा दिखाए मार्ग पर चले सफलता अवश्य मिलेगी। माँ के विषय में जितना लिखो उतना ही कम हैं। 

      Friday, May 6, 2016

      swach bharat abhiyan

      हमे अपने वातावरण को साफ सुथरा रखना चाहिए ये तो सब जानते है लेकिन इस बात पर अमल कौन करता है । और अगर सही कहे तो हमारे समाज में गंदगी की भी एक जगह बन गयी है या ये कह सकते है की गन्दगी की भी समाज में जगह है ।हमे कुछ देखने को मिले न मिले कहीं न कहीं कचरे का ढेर लगा जरूर दिखेगा, बस उनकी शक्ल या फिर मात्रा अलग अलग हो सकती है । और इस परेशानी से निपटने के लिए ही हमारे देश के प्रधानमंत्री ने देश में स्वछ भारत अभियान की शुरुआत की। शुरूआती दौड़ में बड़े नामी गिरामी लोगो ने बढ़ चढ़ क़र सफाई अभियान में हिस्सा लिया । जो की बहुत ही गर्व की बात है । लेकिन दुख की बात यह है की कुछ लोगो ने शुरूआती दिनों में एक या दो दिन इस अभियान में सफाई करते हुए अपनी फ़ोटो मिडिया में और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे शेयर की । और कुछ ने तो साफ जगह को ही साफ डाला और कुछ ने तो बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और यह सही भी है और कहीं न कहीं बदलता और स्वछ भारत नज़र भी आ रहा था लेकिन अब काफी दिन बीत जाने के बाद कुछ लोग अपनी जिम्मेदारी को भुल गए है ये स्वछ भारत अभियान किसी एक का नही है ये पुरे देश के लिए और हर एक नागरिक के उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की हमारे देश के लिए ।
      लेकिन कुछ लोग कहते है की ये मेरा काम थोड़े ही है लेकिन क्या वो अपने घर को साफ नही करते ।
      स्वछ भारत के अभियान को सफल बनाये काफी दिन से मुझे लग रहा हैं कि  कही फिर से लोग भूल तो नही गए इस अभियान को अपनी जिम्मेदारियों को समझे और स्वछ बनाने में अपने देश का साथ दे।
      कभी कभी ऐसा भी होता है की हमारा शहर अचानक  बहुत साफ दिखने लगता है तो हम आपस में पूछते है की क्या कोई आने वाला है क्या? जैसे कोई मंत्री या बड़ा नेता । क्योंकि जब कोई शहर में आने वाला होता है तो सड़क से लेकर नुक्कड़ तक साफ़ करवा दिए जाते है तो आने वाले को पता ही नही चल पता की शहर में गन्दगी है या नही । लेकिन क्या ये बिना किसी के आये रोज़ नही हो सकता ? हो सकता है लेकिन कोई अपनी जिम्मेदारियो को समझता नही ।
      जो कहीँ कचरा फेके उसे एक बार कूड़ेदान में डालने के लिए टोंकें जरूर मुझे विश्वास है की वो अगली बार कचरा इधर उधर फेकने से पहले सोचेगा जरूर।

      Saturday, April 30, 2016

      LABOUR DAY

      आज मजदूर दिवस  है क्या हम जानते है की ये मजदूर दिवस क्यों और कब से मनाया जाता है।  कोई नहीं चलिए मैं  बताता हूँ ,मजदूर दिवस की शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय हुई जब मजदूर मांग कर रहे  थे कि काम की अवधि 8 घंटे हो और सप्ताह में एक दीं छुट्टी हो। इस हड़ताल में एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और फिर पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों की मौत हो गई और कुछ पुलिस  अफसर भी मारे गए। इसके बाद 1889 में पेरिस महासभा की द्रितीय  बैठक में फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारीत  किया गया की एक मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए उसी समय से दुनिया के 80 देशो में 1  मई को राष्ट्रिय अवकाश घोषित हुआ।









      मजदूरी का अर्थ सेवा है ,सेवा  प्रदान करने वाला व्यक्ति ही मजदूर कहलाता है। काम करने वाला व्यक्ति चाहे खेत हो या फिर सड़क या कोई ऑफिस वो मजदूर की श्रेणी में ही आता है। क्योकि हर महीने मालिक द्वारा दिए जाने वाले वेतन पर निर्भर होता है क्युकी वो उनके लिए काम करता है। बहुत से लोग मजदूर दिवस के इतिहास से अंजान है। भारत में पहली बार मजदूर दिवस 1923 में मनाया गया। जिसका सुझाव सिंगार वेलुचेट्टियर नाम के एक  कम्युनिष्ट  नेता ने   किया।

      आज मजदूरों की दशा सोचनीय है क्योंकि उनको  मेनहत   के अनुसार भत्ता नहीं मिल पा  रहा। अभी मैं फ़िलहाल इतना ही  चाहूंगा क्युकी आज श्रमिक दिवस है और मैं नकारात्मक लेख नहीं लिखना चाहता।