Saturday, December 13, 2025

बच्चे के प्रथम 1000 दिवस

मजबूत भविष्य के लिए बच्चों के प्रथम 1000 दिवस है महत्वपूर्ण 

भारत में बच्चों के बचपन और उनके सर्वांगीण विकास पर पहले से कहीं अधिक ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन क्या क्या हम सच में जानते हैं कि बच्चे के जीवन के प्रथम 1000 दिवसयानी 

गर्भधारण (कन्सेप्शन) से लेकर बच्चे के 2 वर्ष की उम्र तक—कितने निर्णायक होते हैं?

लेकिन विज्ञान और शोध कुछ और ही कहते हैं।
अक्सर यह सोच बना ली जाती है कि “बच्चा जैसे-तैसे बचपन पार कर ले, बड़ा होकर खुद सब समझ जाएगा।”


प्रथम 1000 दिवस क्या होते हैं?

प्रथम 1000 दिवस की अवधि में शामिल होते हैं—

  • गर्भावस्था के लगभग 270 दिन
  • जन्म के बाद के पहले 730 दिन (0–2 वर्ष)

यही वह समय है जब बच्चे के शरीर, मस्तिष्क, भावनाओं और व्यवहार की बुनियाद रखी जाती है।

मस्तिष्क विकास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • वैज्ञानिक शोध के अनुसारबच्चे के मस्तिष्क का लगभग 80% विकास 2 वर्ष की उम्र तक हो जाता है
  • इस दौरान हर सेकंड बच्चे के मस्तिष्क में 10 लाख से अधिक न्यूरल कनेक्शन बनते हैं।
  • शुरुआती अनुभव—देखना, सुनना, छूना, बोलना और महसूस करना—मस्तिष्क की संरचना को आकार देते हैं।

यानी जो अनुभव बच्चा अपने जीवन के शुरुआती दिनों में करता है, वही आगे चलकर उसके सोचने, समझने और व्यवहार करने की दिशा तय करते हैं।

इस फोटो को बनाने में AI की सहायता ली गई है 

 अगर किसी बच्चे को 0 से 6 वर्ष की उम्र तक प्यार, अपनापन, सुरक्षा और संवेदनशील देखभाल मिलती है, तो—

  • वह आत्मविश्वासी बनता है
  • दूसरों के प्रति सहानुभूति रखता है
  • परिवार और समाज में सकारात्मक संबंध बना पाता है

इसके विपरीत—

  • उपेक्षा
  • हिंसा
  • भावनात्मक असुरक्षा
  • या तनावपूर्ण वातावरण

बच्चे के मानसिक विकास को गहराई से प्रभावित करता है, जिसका असर जीवन भर देखा जा सकता है।

पोषण: शारीरिक ही नहीं, मानसिक विकास की कुंजी

प्रथम 1000 दिवस में सही पोषण अत्यंत आवश्यक है—

  • गर्भावस्था के दौरान माँ को पर्याप्त आयरन, फोलिक एसिड, कैल्शियम और प्रोटीन मिलना चाहिए।
  • जन्म के बाद पहले 6 माह तक केवल स्तनपान बच्चे को संक्रमण से बचाता है और मस्तिष्क विकास में सहायक होता है।
  • 6 माह बाद पूरक आहार (घर का पौष्टिक भोजन) देना अनिवार्य है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार—

कुपोषण के कारण बच्चे की सीखने की क्षमता और उत्पादकता जीवन भर प्रभावित हो सकती है।

क्यों ज़रूरी है प्रथम 1000 दिवस पर ध्यान?

  • भारत में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे स्टंटिंग (कम लंबाई) और अल्पपोषण से प्रभावित हैं।
  • शुरुआती देखभाल की कमी के कारण बच्चों की शैक्षणिक क्षमता और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।

इसीलिए सरकार की योजनाएँ जैसे—

  • पोषण अभियान
  • आंगनवाड़ी सेवाएँ
  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम

प्रथम 1000 दिवस को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं।

आज की देखभाल, कल का सशक्त भारत

प्रथम 1000 दिवस केवल बच्चे के जीवन का शुरुआती चरण नहीं हैं, बल्कि यह उसके पूरे भविष्य की नींव हैं।
यदि इस समय में बच्चे को—

  • सही पोषण
  • प्यार और सुरक्षा
  • स्वास्थ्य सेवाएँ
  • सकारात्मक वातावरण

मिल जाए, तो वह एक स्वस्थ, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बन सकता है।

ध्यान रहे - 
बच्चे को “बड़ा होकर समझ आने” के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
उसके भविष्य की दिशा आज, इसी समय तय होती है।

 

Sunday, May 28, 2023

28 May MHM Day, World Menstrual Hygiene Day

हर साल 28 मई को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय माहवारी स्वच्छता प्रंधन दिवस  (World Menstrual Hygiene Day) मनाया जाता है. इसका उद्देश्य माहवारी  स्वच्छता  (menstrual hygiene) और इससे जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. मेंस्ट्रुअल हाइजीन महिलाओं की सेहत (Women Health) से जुड़ा एक बेहद अहम पहलू है. इसका सीधा संबंध महिलाओं के रिप्रोडक्टिव हेल्थ से होता है. 
Photo Internet

लेकिन अक्सर हमारे समाज में माहवारी को लेकर आज भी बहुत पर्दा है लोग कहकर बात नहीं करते है खासकर माहवारी को लेकर पुरुष और लड़के अपनी चुप्पी बनाये रखते है वह खुलकर इसपर चर्चा नहीं करते है. पुरुषों और लड़कों को महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को समझना होगा और यह जो भ्रांतियां और चुप्पी है उसपर कहकर बात करनी होगी. माहवारी पर चर्चा न कोई घर में करता है और न ही कोई बाहर करना चाहता है चलो एक बार मान लिया की लोग घर के बाहर इसपर चर्चा करते हैं लेक्रिन क्या उनको सही जानकारी होती है और अगर सही जानकारी नहीं है माहवारी को लेकर तो ऐसे लोग तो भ्रान्ति और सामाजिक रुढियों को ही मानेंगे न.
Photo From Internet

आइये जानते है. क्यों यह 28 मई को ही मनाया जाता है -
2013 में जर्मन नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन WASH यूनाइटेड द्वारा मासिक धर्म स्वच्छता दिवस की शुरुआत की गई थी. यह 28 मई को चिह्नित किया जाता है क्योंकि औसतन महिलाओं और लड़कियों को प्रति माह 5 दिन मासिक धर्म होता है और मासिक धर्म चक्र का औसत अंतराल 28 दिनों का होता है. इसलिए 28-5 या 28 मई को दिन को चिह्नित करने के लिए चुना गया था.

Photo Internet

माहवारी सिर्फ लड़कियों और महिलाओं के लिए नहीं है इसके बारे में अपने बच्चों और लडको को भी खुलकर बताना चाहिए। यह सिर्फ महिलाओं और लड़कियों का मुद्दा नहीं है यह सभी का मुद्दा है लडको और पुरुषों को इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए और उनको संवेदनशील बनाना होगा तभी वह अपनी भूमिका निभा सके है ।
माहवारी को लेकर समाज में जागरूकता का स्तर तब समझ आता है जब कोई लड़का पैड लेने मेडिकल या दुकान पर चला जाय लोग उसको ऐसे घूरेंगे जैसे उनके घर में किसी को माहवारी कभी आई ही नहीं हो और फिर काली पन्नी या पेपर में ऐसे रैप करके दिया जाता है जैसे उसमे पैड नहीं कोई बम हो या कोई गैर कानूनी वस्तु हो जो कोई देख न ले ऐसे समाज को देखकर बहुत ही कष्ट होता है की पितृसत्तात्मक समाज में महिला स्वास्थ्य से जुड़ी चीजों को किस तरह से छुपाया गया है । हमको इस अंतर्राष्ट्रीय माहवारी दिवस पर इसपर खुलकर चर्चा करने की जरूरत है और इससे जुड़े रूढ़ियों को अब और नही बढ़ावा देना है ।

माहवारी के समय एक विशेष ध्यान और सम्मान की जरूरत होती है महिलाओं और लड़कियों को जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य भी सही रहे और वह खुलकर अपनी बातों को रख सकें।

Friday, January 13, 2023

संविधान उद्देशिका और अर्थ

हमारे भारत का संविधान सबसे लम्बा लिखित संविधान है। जब संविधान बनाया जा रहा था और संविधान सभा का गठन किया जा रहा था तो कई देशों ने भारत को कहा की हम आपका संविधान बनाने में सहायता कर देंगे। लेकीन भारत के लोगों ने जो उस समय भारत के संविधान की मांग कर रहे थे उनका कहना था हम अपना संविधान खुद बनाएंगे इसमें किसी भी बाहरी से मदद नहीं लेंगे भले ही कितने दिन भी लगे।

संविधान किसी देश की आत्मा के समान होती है, यह एक ऐसा रास्ता बताता है जिसपर चलकर देश सुख, समृद्धि और विकास की तरफ अग्रसर होता है। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में डॉक्टर भीम राव अंबेडकर और अन्य महान विचारकों द्वारा मिलकर इस संविधान को तैयार किया गया था। 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ, जिसको बनाने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा।

 
संविधान उद्देशिका

आइए जानते हैं इसमें निहित शब्दों के कुछ सरल अर्थ।

हम भारत के लोग – भारत देश में रहने वाला हर व्यक्ति चाहे वह भूतकाल का हो या भविष्यकाल में हो या वर्तमान काल में हो जीवित हो या मर चुका हो जिसको भारत की नागरिकता हो वह भारत के लोग कहलाते हैं, चाहे वह किसी जाति, धर्म या वर्ण का हो– मतलब भारत के समस्त नागरिक शामिल हैं दूसरे शब्दों में भारतीय संविधान भारतीय जनता को समर्पित है।


प्रभुत्व सम्पन्न   भारत ना तो किसी अन्य देश पर निर्भर है और ना ही किसी अन्य देश का डोमिनियन है। इसके ऊपर और कोई शक्ति नहीं है और यह अपने आंतरिक और बाहरी मामलों का निस्तारण करने के लिए स्वतंत्र हैं।


समाजवादी- राज्य इस तरह काम करेगा की अभी को समान अवसर और समान दर्जा मिलेगा, ऐसी संरचना जिसमें उत्पादन के मुख्य साधनों, पूँजी, जमीन, संपत्ति आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में  समतुल्य सामंजस्य हो।


पंथनिरपेक्ष- यह शब्द राज्य के लिए है की राज्य का कोई धर्म नहीं है। सभी धर्म समान होंगे। राज्य की नजर में सभी धर्म बराबर हैं।


लोकतंत्रात्मक- लोकतंत्रात्मक का अर्थ है अपने प्रतिनिधि को चुनने का अधिकार वोट देने का अधिकार । अलग- अलग स्तर पर अपने प्रतिनिधि को चुनने का अधिकार। हर 18 वर्ष से अधिक व्यक्ति को वोट देने का अधिकार और अपनी भागीदारी निभाने का एक महत्वपूर्ण तरीका।


गणराज्यवंशवाद का अंत, राज्य का मुखिया या राष्ट्रपति वंश के अनुसार नही चुना जायेगा। और भारत का कोई भी नागरिक इन चुनाओ में खड़ा हो सकता है ।


स्वतंत्रता- यहाँ स्वतंत्रता का तात्पर्य नागरिक स्वतंत्रता से है। स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल संविधान में लिखी सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है। यह व्यक्ति के विकास के लिये अवसर प्रदान करता है।


न्याय – लोगों को  तीन तरह के न्याय मिल सके जिसमे सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय व आर्थिक न्याय।


समता – नागरिक को स्थिति और अवसर की क्षमता प्रदान करती हैं जिसका अभिप्राय है समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करने की उपबंध।

बंधुता– भाईचारे की भावना। प्रस्तावना के अनुसार बंधुत्व में दो बातों को सुनिश्चित करना होगा। पहला व्यक्ति का सम्मान और दूसरा देश की एकता और अखंडता। मौलिक कर्तव्य में भी भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है।


प्रतिष्ठा और अवसर की समता : इस शब्द का तात्पर्य है कि अतार्किक विशेषाधिकारोँ की समाप्ति, आगे बढ़ने के समान अवसर तथा मानव होने के आधार पर सभी समान हैं।


आत्मार्पित- समर्पित कर देना।


(यह ब्लॉग संविधान के बारे में सिर्फ जानकारी को बढ़ावा देने हेतु एक छोटा सा प्रयास है।)







 


Wednesday, December 28, 2022

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न कानून "इसे भी जाने"

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013
 आज हम महिलाओं को एक साथ लेकर चलने की बात करते हैं और महिलाओं और लड़कियों को जब भी अवसर मिलें हैं उन्होंने यह साबित किया है कि अगर अवसर मिले तो वह किसी से कम नहीं हैं और आज की नारी और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं है कोई ऐसा काम नहीं है जो एक महिला और पुरुष में भेद पैदा करता हो और वह अब आधुनिक भाग दौड़ भरी जिंदगी का एक अहम पहलू हैं इसी के मध्यनजर हम यह भी जानते है की आजकल महिलाएं और लडकियाँ खुद के पैरों पर खड़ी है वह विभिन्न जगहों पर काम करती हैं चाहे वह गाँव हो या शहर हो वह भी अब अपने परिवार और अपने भरण पोषण के लिए नौकरी कर रही है और ऐसे में बात आती है महिलाओं  कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर, कई बार लोगों को पता नहीं होता है की ऐसा भी कोई कानून है जो सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के लिए ही है जो उनको कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान करता है, कभी कभी जानकारी न होने के कारण वह अपने उपर हो रहे शोषण को सहती रहती हैं जिससे उनके स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. घर हो या सड़क खेत हो या खेल का मैदान, कालेज हो या स्कूल महिलाओं के साथ हिंसा की कोई वजह नही होती है, यह हिंसा न केवल उनके अस्तित्व को चोट पहुचाती है बल्कि उनके सेहत उनके मनोबल को भी चोट पहुचाती है, हिंसा के रूप में यौन हिंसा करना भी उत्पीडन है चाहे वह कार्यस्थल पर ही क्यों न हो रहा हो.
सन् 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम को पारित किया गया था।जिन संस्थाओं में दस से अधिक लोग काम करते हैं उन पर यह अधिनियम लागू होता है  ये अधिनियम 9 दिसम्बर, 2013 में प्रभाव में आया था। जैसा कि इसका नाम ही इसके उद्देश्य रोकथाम  निषेध और निवारण को स्पष्ट करता है और उल्लंघन के मामले में, पीड़ित को निवारण प्रदान करने के लिये भी ये कार्य करता है।
(photo internet)
कार्यस्थल पर होने वाले कुछ अवन्छिक व्यव्हार यौन उत्पीडन कहलाते है – जैसे – अनचाहे स्पर्श, गले लगना, लिपटना या चूमना, घूरना, ताकना, सिटी बजाना, आंख मारना, अश्लील हरकतें जैसे जान भूझकर चिपकना, गुप्तांगों को सहलाना, होठों पर जीभ फेरना, ऑंखें तरेरना, नोचना, चिकोटी काटना. यौन अर्थ वाले शब्द कमेन्ट, गाली, किसी भी तरह की यौनिक मंशा के साथ की गई जबरदस्ती इस हिंसा के दायरे में आती है – इसके लिए हर कार्यस्थल पर एक कमेटी बनी होती है जिसकी शिकायत आप वहां कर सकते हों और अगर कोई ऐसा व्यक्ति इसमें संलिप्त पाया गया जो इस कमेटी में है तो वह उस कमेटी से निकल दिया जायेगा और उसकी जगह कोई जब तक नहीं आ जाता तब तक निर्णय नहीं होगा या फिर जिलाधिकारी को भी इसकी शिकायत की जा सकती है और इसमें महिला मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं का भी सहारा लिया जा सकता है नही तो सीधे पुलिस से भी  सकी सहायता ली जा सकती है अगर कोई महिला इसका शिकायत करना चाहती है तो यह शिकायत लिखित में होनी चाहिए 

आपके लिये यह जानना बेहद जरूरी है कि इस संबंध में नीतियां ;पोलिसीद्ध क्या कहती हैं। ताकि आप उसके अनुसार तैयारी कर पाएं। साथ ही अपने कानूनी अधिकारों को जानें। इससे संबंधिक कानूनों को पढ़ें या किसी कानूनी जानकार से विकल्पों के बारे में जानकारी लें।
सबसे पहला कदम ये उठाएं उत्पीड़न के मामले में जो सबसे पहला कदम उठाना चाहिये वो ये है किए आप सीधा जाकर उस व्यक्ति से बात करें जो आपको परेशान कर रहा है। और उसे इस बात का अंदेशा दें कि आप बर्दाश्त करने वाले या चुप रहने वालों में से नहीं हैं। उसे इस संबंध में एक लिखित चेतावनी भी दें। यदि उससे बात कर कोई फायदा न होए तो अपने सानियर से इसकी शिकायद करें। अपने एचआर ;ह्यूमन रीसोर्सद्ध मैनेजर को भी इसमें शामिल करेंए ताकि वे आपको आगे की कार्रवाई के बारे में सूचित कर सकें। इस मामले को अब लिखित बनाएं।
पीड़ितों और गवाहों को जुटाएं इस बात की पूरा संभावना है किए आपको परेशान कर रहे व्यक्ति ने पहले भी लोगों के साथ उत्पीड़न किया होए या वो हाल में भी और लोगों के साथ ऐसा करता या करती हो। उन लोगों से बात करें और उन्हें एक साथ जुटाने की कोशिश करें। अपने लिये किसी प्रत्यक्ष गवाह को तैयार करने की कोशिश करें। जितने हो सके सबूत जुटाएं। बाकी पीड़ितों से भी लिखित सूचना या चेतावनी देने का आग्रह करें ताकि आप सभी का केस मजबूत बन पाए। इसके बाद सीनियर मैनेजमेंट से इस संबंध में बात करें। उनके सामने सभी संभव सबूत ले जाएं। उत्पीड़न करने वाले के खिलाफ मुकदमा करें
अपने विकल्पों का मूल्यांकन करने के लिए वकील से सलाह लें। स्पष्ट रहें और सुनिश्चित कर लें कि आप बदले में क्या चाहते हैं जैसे मुआवजा या अगर आपको नौकरी से निकाल दिया गया होए तो अपनी नौकरी में वापसी।

      Friday, May 20, 2022

      जेंडर और सेक्स क्या है ?

      मैं समाजिक पिछले कुछ सालों से सामाजिक क्षेत्र से जुड़ा हूँ जहाँ मुझे महिलाओं, पुरुषों, किशोर - किशोरियों और बच्चो के साथ काम करने का अनुभव हुआ है, मुझे लगा की कुछ प्राथमिक जानकारियां जो की बेसिक हैं क्यों न उनपर कुछ लिखा जाय मेरा लिखना भी हो जायेगा क्युकी इंटरनेट पर जानकारियां तो बहुत हैं लेकिन हमको जो चाहिए वह नहीं बहुत ज्यादा जानकारियां है मुझे लगा कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखने से सामाजिक दिशा में चल रहे प्रयासों की तरफ एक कदम भी बढ़ेगा. जिस तरह से मैं शोषित तथा वंचित समुदाय को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए कार्यरत हूँ जिसमें कुछ विषय हैं जो बहुत ही छोटे लगते हैं लेकिन हमारी जिंदगी में बहुत अहमियत रखते हैं जैसे – महिला स्वास्थ्य, जेंडर, समता- समानता, SRHR को लेकर कुछ अहम् जानकारियों को लिखने का प्रयास करता रहूँगा. आने वाले समय में मैं इन विषयों पर और फेमिनिस्ट मुद्दों पत भी लिखने का प्रयास करूंगा.

      जेंडर और सेक्स में क्या अंतर होता है ?
      जेंडर एक सामाजिक विचार धारा है और जेंडर इंसानों द्वारा बनाया गया है जेंडर में पर्रिवर्तन हो सकता है, जेंडर स्थान के बदलने के  साथ बदलता रहता है, जेंडर सार्वभौमिक नहीं होता है.

      सेक्स क्या होता है ?

      सेक्स जैविक होता है. यह प्रकृति द्वारा प्राप्त होता है सेक्स में इंसानों के जननांगो में विभिन्नताए पाई जाती है जैसे स्तन , योनी , शिश्न . महिला और पुरुष को अलग बनाते है और लिंग को बदला नही जा सकता हाँ आजकल विज्ञानं की सहायता से इसको बदला जा सकता है लेकिन अगर विज्ञानं का सहारा न लिया जाय तो इसको बदला नहीं जा सकता है. सेक्स को बदला नही जा सकता 

      इसको एक उदहारण से अगर समझना हो तो हम ऐसे देख सकते हैं –

      क्या पुरूषों द्वारा किसी नवजात शिशु को दूध पिलाया जा सकता है? आपके मन में क्या आया ?

      नहीं ......   यही आपके मन में आया न.. ये हैं जेंडर क्युकी यह धारणा हमारे मन में इसलिए है क्युकी हम सोचते है की पुरुष ऐसा कोई काम नहीं कर सकता है -

      हाँ पुरुष शिशु को दूध पिला सकता है लेकिन स्तन पान नहीं करा सकता है इसमें शिशु को दूध तो कोई भी पिला सकता है बोतल से लेकिन स्तन पान सिर्फ महिला करा सकती है तो इसमें हमारी धारणा बन चुकी होती है की पुरुष बच्चो को नहीं सम्भाल सकते यह जेंडर है और स्तन पान करवाना जैविक है इसलिए वह सेक्स कहलाता है.
      समुदाय में हम इस तरह के भी उदहारण को पेश कर सकते हैं .


      किस तरह से हमारे समाज और परिवार में जेंडर आधारित हिंसा या भेदभाव देखने को मिलता है   जैसे लडको को कही भी आने जाने की आज़ादी होती है लेकिन लड़कियां अपनी मर्ज़ी से कही आ जा नहीं सकती है , लड़के शहर जाकर पढ़ सकते हैं लेकिन लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से पढने की आज़ादी नही और कही बाहर जाकर पढने नही दिया जाता है, लड़कियों को घूंघट में रहना पड़ता है लेकिन लडके कुछ भी पहन सकते है लडको को निर्णय लेने का अधिकार होता है लेकिन घर में लड़कियों को निर्णय लेने का कोई अधिकार नही दिया जाता है , लडकियों से ज्यादा काम करवाया जाता है 

                                                                                                                                                                    

        धन्यवाद 

      Thursday, March 22, 2018

      जल दिवस और जल संकट

       मानव जीवन के लिए सबसे उपयोगी और महत्वपूर्ण है "जल"। आपने यह तो सुना ही होगा कि "जल ही जीवन है" , लेकिन इस बात पर कभी गंभीरता से विचार किया है की आने वाले समय में जल संकट एक गम्भीर समस्या बनने वाली है। यह मैं इसलिए सचेत करवा रहा हूँ क्योंकि आज विश्व जल दिवस है । और यह पहली बार 1993 में मनाया गया था। सिर्फ जल दिवस मनाना ही समस्या का समाधान नहीं है हमें मिलकर जल संरक्षण का कार्य भी करना होगा ।  हमारी जिंदगी का मुख्य केंद्र पानी है लेकिन हम अपनी योजनाओं में इस केंद्र बिंदु पर ध्यान केन्द्रित ही नहीं कर रहे हैं जबकि हम तेजी से विकसित हो रहे हैं।







       जल संकट 


      गाँवों तथा शहरों में दिन प्रतिदिन पेयजल का संकट गहराता जा रहा है । इसके पीछे कारण पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो अथवा बढ़ती जनसंख्या या वर्षा जल संचयन का अभाव । एक मुख्य कारण जल संकट का यह भी हो सकता है की भारत में वर्षा कुछ माह तक ही सीमित है और वह भी अनिश्चित है ।




      (Photo internet)



      भारत की गिनती आफ्रिका ,आस्ट्रेलिया उत्तरी अमरीका जैसे 26 ऐसे देशो मे की जाती है जहाँ पानी की कमी है । आज देश के 50% जिले पपनी की दृष्टि से सूखे क्षेत्रों की श्रेणी मे आते हैं । राजस्थान बिहार , उत्तर प्रदेश ,कर्नाटक ,आन्ध्र प्रदेश के अधिकांश जिले बराबर सूखे की चपेट मे आते रहते हैं ।  मध्य प्रदेश ,दिल्ली ,गुजरात मे यहाँ तक की केरल में भी जहाँ की जल की विपुल सम्भावनाएं  हैं । लोगो को स्वछ जल उपलब्ध नही हैं एक अनुमान के अनुसार 15 राज्यो मे भूजल स्तर 5 से 7 प्रतिशत की दर पर प्रतिवर्ष गिर रहा है , जबकि भारत की 80% आबादी स्वछ जल हेतु भूजल पर निर्भर है ।


      (Photo internet)



      पेयजल की समस्या के साथ ही प्रदूषित जल की समस्या भी विकट है । आज देश में लगभग 22 नदियाँ प्रदूषण की शिकार हैं । विश्व जल आयोग ने गंगा नदी को विश्व की 7 प्रदूषित नदियो मे से एक माना है । रही कसर तेज़ी से बढ़ते औध्योगिकीकरण पर्यटको का बढ़ता दबाव नदियों बांधों और तालाबों मे गंदगी जमा होने से उत्पन्न प्रदूषण पूरी कर दी है । पानी की गुणवत्ता मे गिरावट से फ़्लोरोसिस ,पीलिया ,पेट तथा चमड़ी रोग , कैंसर जैसी बीमारियाँ पैदा हो रही हैं । विश्व स्वस्थ संगठन का आकलन है की विश्व के पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौत जल जनित बीमारियो से हो रही है ।



      इसलिए आज समय की मांग है की जल संकट के संधानों पर काम किया जाय । पानी का विवेक सम्मत तरीके से उपयोग किया जाय और भूजल के रिचार्ज और डिस्चार्ज मे संतुलन स्थापित किया जाय । 
      भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई और ड्रिप जैसी वैज्ञानिक टकनिके विकसित कर्णी चाहिए ।  सरकार के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति को जल संरक्षण को राष्ट्र सेवा मानते हुये अपना 100 प्रतिशत देना होगा ।  


      देश भर मे जल सिक्षा की औपचारिक तथा अनौपचारिक  शिक्षा  पर ध्यान देना होगा जल नीतियाँ तैयार करनि होंगी । देश की सभी नदियो को आपस मे जोड़ देना चाहिए । नदियों का ये जुड़ाव सिर्फ बाढ़ और  सूखे से निजाद नही दिलाएगा बल्कि इससे संचित क्षेत्रफल बढ़ेगा , एक नदी  का अतिरिक्त पानी दूसरी नदी मे भेज कर जरूरत के मुताबिक अन्य इलाकों में पहुंचाया जा सकता है , बिजली का उत्पादन बढ़ाने मे मदद मिल सकती है और पेयजल की सहज उपलब्धता सुनिश्चित हो सकती है ।



      जल के संबंध मे हमारा ध्यान मुख्य रूप से तीन बातों पर केन्द्रित होना चाहिए – जल की उपलब्धता , उसकी गुणवत्ता तथा आम लोगो तक उसकी निरबाध्य पहुँच । कहना न होगा की हमारे ढांचागत विकास की शर्तो मे भी जल की उपलब्धता जहाँ एक एक अनिवार्य शर्त है , वहीं नदियो के किनारे अपनी सभ्यताओं ने भी यह प्रमादित किया है की सामाजिक और आर्थिक विकास के नज़रिये से भी पानी भूत बड़ी पूंजी है ।






      (photo internet)

      जल की कमी किस वजह से हो रही है शायद ही कोई जिसको यह न पता हो।  अगर समय रहते पानी को नहीं बचाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम पानी की एक बूँद देखने के लिए तरसेंगे। इसलिए सभी को अपने अपने तरीके से पानी को बचाना होगा।  क्योंकि "जल है तो ही जीवन है"। 






      Thursday, October 20, 2016

      इस दीपावली


      जी दीपावली का नाम आते ही जेहन में दीप और पटाखों का ख्याल मन में आने लगता है। और आये भी क्यों न आखिर दिवाली है ही दीपों का त्यौहार इसी लिए तो मनाया जाता है अब आप लोगों को ये बताने की जरुरत मैं नहीं समझता की दिवाली क्यों मनाई जाती है क्योंकि हमको बचपन से ही इसके बारे में बताया जाता रहा है वैसे मैं संक्षेप में बता ही देता हूँ की रावण का वध करने के बाद और 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्री राम अयोध्या पहुँचे तो वहा की जनता अपने राजा के स्वागत में घी के दिए जलाये और उनका स्वागत किया ।


      (Photo Internet)



      पहले की दिवाली और आज की दिवाली में कितना बदलाव नज़र आ गया है ये अगर आप खुद ही एक बार दिल से सोचे तो पता लग जायेगा । दिवाली पे लोग अपने घर दुकान और आसपास साफ-सफाई और रंगाई पुताई करवाते है । क्या आपको पता है कि दिवाली भारत ही नहीं अपितु दूसरे देशों में भी मनाया जाता है दीवाली नेपाल, श्रीलंका, म्यामांर, मॉरीशस,गुयाना, मलेशिया, सिंगापुर,फिजी, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया की बाहरी सीमा पर क्रिसमस डीप और भी देशों में  दिवाली पर एक सरकारी अवकाश है।


      इस दिवाली मैं कुछ खास आग्रह करने वाला हूँ जी हाँ मैं इन दिवाली उन लोगों से बात करना चाहता हूँ जो सर्जिकल स्ट्राइक और देश भक्ति फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से दिखाते है क्योंकि अब वो समय आ गया है जब देश भक्ति में कुछ करके दिखाया जाय । दोस्तों सभी जानते है कि पाकिस्तान को चीन की सह प्राप्त है यानि चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है और दिवाली आते ही भारतीय बाज़ारों में रौनक दिखाई देने लगती है लेकिन आपको नहीं लगता कि ये रौनक चाइनीज सामानों से भरी होती है । क्यूँ न इस दिवाली हम अपने सेना को जवानों को सच्ची श्रद्धांजलि दे और हर भारत वासी को इस बार चाइना का कोई भी सामान नहीं खरीदने की सलाह दें , क्योंकि चाइना भारत से व्यापार करके आर्थिक रूप से काफी मुनाफा होता है या तो ये कह ले की हम अपने दुश्मनों का सामान क्यों लें । जी हां इस दिवाली चाइनीज झालर लाइट और मोमबत्तियों का बहिष्कार होना चाहिए जिससे चीन को अपनी औकात पता चल जाय ।


      (Photo Internet )

      इस दिवाली को मिट्टी के दिये ख़रीदे जिससे किसी गरीब की मदद हो जो इस दिए को बना के बेचते है क्या पता उस गरीब का कुछ फायदा ही हो जाय और तेल का दिया जलाये, जिससे वातावरण भी शुद्ध होगा और चाइनीज सामानों को भी बढ़ावा नही मिलेगा । दोस्तों पिछली दिवाली को प्रधान मंत्री ने भी मिट्टी के दिए जलाने का आग्रह किया था जिसपे बहुत से लोगों ने अमल भी किया था । लेकिन इस बार कोई भी बहाना न करिये और स्वदेशी चीजों का इस्तेमाल करिये । अपने देश के प्रति अपनी भागीदारी को समझीये । अगर आपने अपनी दिवाली की खरीदारी कर ली है तो कोई नही लेकिन आगे से चाइनीज समानो का बहिष्कार करिये ।
      (Photo Internet)

      यहां तक की बाज़ारों में चाइनीज दिये और लक्ष्मी गणेश भगवान की मूर्ति भी चाइनीज आ रहीं है अपने देश की कला को पहचानिये अगर अब नही जागेंगे तो कब जागेंगे ? अनजाने में ही सही आप दुश्मनों की मदद करते है । क्योंकि जो गोली हमारे देश के जवानों को लगती है इन्ही पैसों से आती है चीन हमारे ही दम पर हमें ही आँख दिखाता है । हमारे भारत के बाज़ारों में चीन ने काफी अच्छी पकड़ बना ली है। इस पकड़ को कमज़ोर करना है इस दिवाली निकलेगा चाइनीज सामानों का दिवाला । इस बार कुछ कर दिखाना है । पुतले और कैंडल मार्च तो बहुत निकाल लिए अब कुछ कर दिखाने का समय है इसको नष्ट न करे और अपने आस पड़ोस बच्चों बड़ो जो भी ये लेख पढ़े सभी से विनम्र आग्रह है कि अपने देश को आगे बढ़ाने में मदद करें ।
      और इस दिवाली स्वदेशी दिवाली मनाइये देखिये उन लाइटों से ज्यादा आनंद दिये में आयेगा ।
      दिवाली ही नही बल्कि हमेशा के लिए चाइनीज चीजों का बहिष्कार होना चाहिए इसकी शुरुआत इस दिवाली से करना है दोस्तों । दूसरों को भी इसके बारे में जानकारी देते रहे और भारतीय होने का फ़र्ज़ निभाएं।
      शुभ दिवाली और सुरक्षित दिवाली सभी को दिवाली की हार्दिक शुभ कामनाएं ।

      Friday, October 7, 2016

      सर्जिकल स्ट्राइक

      भारत माता की जय जी हाँ हमारी सेना ने जो काम किया है उसके लिये तो सिर्फ यही कहना है सभी भारत वासी का मैं बात कर रहा भारत के द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक का जिसमें सेना के जवानों के जज्बे को सलाम । सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पहली बार भारत में सभी राजनितिक पार्टिया सेना के साथ दिखी और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब के लिए सेना को बधाइयां दी । लेकिन जब कुछ राजनीतिक पार्टियों से ये नहीं देखा गया की सरकार की वाहवाही हो रही है या ये कह ले की वर्तमान पार्टी को कही कुछ फायदा तो नही हो रहा ।
      लेकिन अचानक से न जाने कहा चली गयी उन विपक्षी पार्टियों की देशभक्ति की वो सेना के जवानों पर ही संदेह कर बैठे की सर्जिकल स्ट्राइक हुआ भी है या नहीं अरे विपक्ष में रहने का या मतलब जरूर है कि वो वर्तमान सरकार का विरोध करें लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वो सेना और शहीदों पर भी राजनीती शुरू कर दें ।
      अरे जाकर कोई पूछे उन शहीदों के माँ बाप से जिन्होंने अपने बेटे और उस पत्नी ने जिसने अपना पति खोया हो और उस बच्चे पे क्या बीतेगी जिसने अपने पिता का साया खोया हो।
      उन भारत माँ के सपूतों को याद करने के बजाय ये बेवजह की बयान बाजी के इस दौर में हर पार्टी शामिल है । कोई भी इससे अछूता नही रहा है ।
      शर्म आनी चाहिए उन लोगों को एक तरफ जवान अपने जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करता है और दूसरी तरफ वो लोग जो अपने घर में सुरक्षित है बयान पे बयान दिए जा रहे ।
      कम से कम सेना को तो अपना काम सही ढंग से करने दिया जाय उनका हौसला अफजाई न कर सके तो उनके उस विश्वास और प्यार को टूटने भी न दिया जाय सोचिये उस जवान पे क्या गुजरेगी जो सरहद पे अपने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति लगा देते हैं ।
      (फोटो इन्टरनेट)

      मैं किसी एक पार्टी या व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ नही कहना चाहूंगा क्योंकि देश की जनता देख रही है कि कौन क्या कह रहा है , किसी को कुछ बताने की जरुरत नही है ।
      हमारे देश की सीमा सुरक्षित है तभी हम चैन की नींद सो पा रहे है और उनके ही कार्य प्रणाली पे सवाल उठाना खुद चुल्लू भर पानी में डूब मरने जैसा है ।
      राजनीती का मतलब ही भूल गए है हमारे नेता की किस भाषा का प्रयोग करना चाहिए । कोई भी कुछ भी बोल देता है राजनेता तो छोड़िए कुछ अभिनेता भी इस मौके का फायदा उठाने में बाज़ नही आ रहे चाहे कभी सरहद पर जाकर ये देखने की कोशिश न की हो की कैसे सीमाओं को सुरक्षित रखते है ये जवान । लेकिन सबकी देश भक्ति सोशल मिडिया फेसबुक ट्विटर या किसी वीडियो से दिख रही है अरे मदद करनी ही है तो उन शहीदों को जाकर सच्चे दिल से श्रद्धांजलि दो ।
      (फोटो इन्टरनेट)
      ये पहला ऐसा मौका होगा की देश के ही नेता अपने देश की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं दिख रहे । जनता को अब सोच समझकर ही अपना वोट देना होगा ।
      क्योंकि ये लोग खुद तो शर्मसार होते ही बल्कि देश का नाम भी खराब करते है दूसरे देशों में ऐसा लगता है ये अपने देश नही पड़ोसी देश की तरफ से चुनाव की तैयारियां कर रहे । मैं क्या कहना चाहता हूँ कुछ बुद्धिजीवी लोगों के समझ आ गयी होगी क्योंकि मैं किसी का नाम लेकर उन्ही लोगों की लिस्ट में नहीं शामिल होना चाहता । क्योंकि पाकिस्तान जैसे देश का साथ जब पूरी दुनिया नहीं दे रही तब ये राजनेता ऐसे बयान देकर एक चिंतनीय विषय स्थापित करते है ।
      आज एयर फोर्स डे है इस अवसर पर देश के वीरों को सत् सत् नमन करता हूँ। ऐसे ही वो दुश्मनों को मुह तोड़ जवाब देते रहे इसकी कामना करता हूँ।
      जय हिंद जय भारत

      Monday, August 29, 2016

      राष्ट्रिय खेल दिवस और मेजर ध्यान चंद


      आज राष्ट्रिय खेल दिवस है और क्या आपको पता है की भारत में राष्ट्रिय खेल दिवस 29 अगस्त को क्यों मनाया जाता है।क्योंकि 29 अगस्त के दिन ही हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद का जन्मदिन है । जी हाँ भारत के हॉकी के जादूगर का जन्म 29 अगस्त 1905 में इलाहबाद में हुआ था।




      (फोटो इन्टरनेट) 

      मेजर ध्यान चन्द को क्रिकेट में सर डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल में पेले के समतुल्य माना जाता है जैसे की हम सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते है वैसे ही मेजर ध्यान चंद को हम हॉकी का जादूगर कहते है।

      क्योंकि ध्यानचंद जब खेलते थे तो बॉल उनकी हॉकी से यू चिपक जाती थी जैसे चुम्बक में लोहा चिपक जाता हो। और यहां तक की उनकी हॉकी में चुम्बक होने की आशंका होने को लेकर उनकी हॉकी तक तोड़ के देखी गयी। और जब वो खलते थे तो दर्शक तो उनके मुरीद हो ही जाते थे बल्कि प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी भी उनके खेल के कायल हो जाते थे। उनके इस जादूगरी के बारे में न जाने कितने किस्से है जिनको बताने के लिए शब्द भी कम पड़ जायेंगे। यहां तक की एक बार उनके खेल की कलाकारी से मोहित होकर  जर्मनी के जिद्दी तानाशाह हिटलर ने उनको जर्मनी की तरफ से खेलने  की पेशकश की थी जिसको इस भारत के सपूत ने ठुकरा दिया था और भारत की तरफ से ही खेलने का फैसला किया था।





      (फोटो इन्टरनेट)


      समय समय पर मेजर ध्यान चन्द का नाम सुर्ख़ियो में आता है वो भी इस बात को लेकर की उनको भारत रत्न दिया जायेगा लेकिन इतने वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक उनको भारत रत्न नही मिल पाया । आखिर क्यों है उनमे ये बात की भारत रत्न की पेशकश की जाती रही है उनके नाम पर तो मैं ये बता दूं की एक मेजर ध्यान चन्द ही है जो भारत को तीन बार ओलंपिक में हॉकी को स्वर्ण पदक दिलाया था । जी हाँ इसी खिलाड़ी की अगुआई में भारत ने 1928 में एम्सटरडम ओलंपिक फिर 1932 में लॉस एंजलिस और तीसरी बार बर्लिन ओलंपिक 1936 इन्हीं की कप्तानी में भारत को स्वर्ण पदक मिला । और ओलंपिक में 101 गोल और अंतर्राष्ट्रीय खेलों में 300 गोल दागे जिसे आज तक कोई तोड़ नही पाया है एम्सटरडम ओलंपिक में हॉकी मैच में 28 गोल किये गए जिसमे मेजर ध्यान चन्द के अकेले 11 गोल थे। मेजर ध्यान चंद सिंह को 1965 में भारत के तीसरे सबसे बड़े सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया । मेजर ध्यान चंद कैंसर जैसी बीमारी से ग्रसित होकर 1979 में दुनिया को अलविदा कह दिया।



      हमारे देश के वर्तमान प्रधान मंत्री ने अपने आकाशवाणी पे प्रसारित होने वाले कर्यक्रम मन की बात में इस बात का जिक्र भी किया था। भारत को तीन बार स्वर्ण दिलाने के बाद भी मेजर ध्यान चंद को भारत रत्न अभी तक नही मिल पाया है लेकिन एक बार फिर से उनको भारत रत्न देने की मांग तेज़ हो गयी है पुरे देश में ये मांग हो रही है की ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाना चाहिए । यहां तक की उनके नाम पे एक स्टेडियम भी है
      पिछली बार इनकी जगह सचिन तेंदुलकर को मिल गया था । देखना है अब क्या होता है देश को लगातार तीन बार स्वर्ण दिलाने के बाद भी वो इससे वंचित है ।
      आज खेल दिवस पर मेजर ध्यान चन्द को सत् सत् नमन। 

      Wednesday, May 11, 2016

      दहेज़ एक समस्या

      आज दहेज़ प्रथा हमारे समाज का एक ऐसा दीमक बन गया है जो समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। अगर घर में लड़की जन्म लेती है तो कुछ घरो में तो लोग उसकी परवरिश से ज्यादा चिंता उसकी शादी के दहेज़ के लिए करने लगते है । कुछ लोग तो सोचते है की बस कुछ ले दे के लड़की की शादी कर दो बस उनकी जिम्मेदारी ख़तम । और यही कारण है की आज दहेज़ हत्या दिन ब दिन बढ़ रही है । सरकार को इसके लिए कारगर कदम उठाने चाहिए क्योंकि महिलाओ पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाया जाय।


      (फ़ोटो इंटरनेट)

      एक आंकड़े के अनुसार दहेज़ हत्याए पहले से कुछ ज्यादा ही बढ़ी है इसके अनुसार 2007 से  2011 के बिच काफी हद तक नए मामले सामने आये है। 2012 में 2833 दहेज हत्या के मामले सामने आये । जो की 2011 में 2618 थी,2013 में ये बढ़कर 10709 हो गयी।अगर औसतन बात करे तो हर एक घण्टे में एक महिला की दहेज़ को लेकर हत्या होती है । जो की बहुत ही शर्मिंदगी की बात है। समाज में काफी कुछ बदल गया लेकिन ये दहेज़ प्रथा न बदल पाये ।


      दहेज़ लेना या देना कानूनन अपराध है और इसके खिलाफ कार्यवाही भी होती है और अगर ऐसी कोई घटना हो तो उसकी शिकायत अवश्य कराये क्योंकि कभी कभी समाज के डर से बहुत सी महिलाये अपने साथ होने वाले दहेज़ उत्पीड़न को अपने परिवार या जानने वाले को नही बता पाती है और इसका फायदा  वो लोग उठाते है जो दहेज़ के भूखे होते है वो महिलाओ को मानसिक और शारीरिक रूप से कष्ट देते है जो की कानूनन अपराध है । महिलाओ के लिए सरकार द्वारा कई कारगर कदम उठाये जा रहे है । उसके बाद भी अगर ऐसी घटनाये होती है कितने शर्म की बात है लोग बदलाव की बात करते है लेकिन खुद को नही बदलते क्योंकि जब आप बदलेंगे तभी समाज बदलेगा।
      keep change