ये कैसी आजादी है !
बेशक हम आजाद है । मगर इस आजादी के मायने क्या है ? 65 सालो से आजाद इस देश की पहचान क्या है ?किस्सों और किताबों को पीछे छोड़ कर अगर आप इस सवाल को ढूंढ़ने निकलेंगे तो आपको दो तस्वीर दिखाई देंगी । क्या आपने कभी महसूस किया है की देश की उन तस्वीरों में एक तरफ सवरता इंडिया है दूसरी तरफ
बिलखता भारत ।
शिक्षा के केंद्र मैं अशिक्षित
दुनिया के नक्शे पर भारत की छवि एक उभरते एजुकेशन हब की है और यही वह भारत है जो सबसे ज्यादा अशिक्षित आबादी वाले देशों की सूची में शुमार है।
भारत में जिस उम्र के बच्चों को पढ़ना चाहिए वह छोटी-बड़ी दुकानों में काम करते दिख जाएंगे। अपने गरीब मां-बाप का हाथ बटाने के लिए मजदूरी करतें हैं। जिस उम्र में उनके हाथ में किताबों और खिलानों के बजाय फूल बेचते नजर आते है। उनका बचपन छिन-सा जाता है। अशिक्षा की दहलीज पर उनका कदम उन्हें भी नहीं पता।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार कुपोशित बच्चों की संख्या के मामले मे भारत का दूसरा स्थान है।
बरबादी और भूख ।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार कुपोशित बच्चों की संख्या के मामले मे भारत का दूसरा स्थान है।
इसी देश में दूसरी तस्वीर खाद्यानों के भण्डारण में भी नजर आती है। एक और भूख और कुपोसण है जहा बच्चे, बुजुर्ग भूख से तड़पते है, जहां महंगाई के कारण एक गरीब मजदूर दो वक़्त की रोटी नहीं जुटा पाता। वहीं दूसरी ओर सरकारी विभागों में अनाज सड़ता नजर आता है। भण्डारण की सही व्यवस्था न होने से खाद्यानों की बर्बादी लगातार जारी है। क्या किसी से भूख से मरने वालों की जान की कोई कीमत नहीं
क्या हम सब एक हैं ?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देष है। जहां विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहतें है। यहीं हर रंग हर मजहब के लोग है। राजनैतिज्ञों ने हमेशा जाति और मजहब के नाम पर खूब वोट बैंक भरे है जिन्होंने समय के साथ दंगों का रुप ले लिया। हम एक तो है हमें अलग करने की राजनीति कर रहे है ये राजनैतिज्ञ। हम गर्व से हमेशा कहते है,हम हिन्दु है ,मुस्लिम है,सिख है,इसाई है पर हम इतने पढे़ लिखे होने के बावजूद स्वयं को हिन्दुस्तानी कब बोलेगें ।
क्यों है ऐसी तस्वीर -
जब भगवान भी हमारे ख़ून का रंग नहीं कर सका अलग
तो हम क्यों मजहब के नाम पर बट जाते हैं ?
आजाद भारत गुलाम किसान
इस देश की 60% आबादी आज भी खेती किसान पर निर्भर है। इस आबादी में पिछलें पन्द्रह सालों के आत्महत्या के आकड़े 2,50,000 की संख्या पार कर चुके है।
यहां किसानों को अपनी कृशि के लिए कर लेना पड़ता है। जहां तक है बिना कर के 70% किसान खेती करने में असमर्थ है। करीब 40 -50 साल से राश्ट्रीकृत बैंक और एजेंसी कर दे रहीं है।
सरकार का मूल उद्देश्य बैंकों द्वारा लोगों के सोशल अपलिफमेन्ट में सहभागीदार बनना और विषेशकर किसानों को साहूकारों से छुटकारा दिलाना था, परन्तु इतने साल बीतने के बाद भी किसान साहूकारों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाये । क्यों ?
सबको माँ चाहिए ,बहन चहिये ,तो फिर बेटी क्यों नहीं चहिये ?
सरकार का मूल उद्देश्य बैंकों द्वारा लोगों के सोशल अपलिफमेन्ट में सहभागीदार बनना और विषेशकर किसानों को साहूकारों से छुटकारा दिलाना था, परन्तु इतने साल बीतने के बाद भी किसान साहूकारों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाये । क्यों ?
कैसे करेंगे कन्या पूजन
भारत मैं कन्या को देवी की तरह पूजा जाता है । यहीं उलट कन्या भ्रूण हत्या के मामलों को बढ़ती लगातार लिगं अनुपात को प्रभावित कर रही है ।पंजाब ,राजस्थान जैसी जगहों पर आज भी ऐसे मामले देखने को मिलेंगे ।सबको माँ चाहिए ,बहन चहिये ,तो फिर बेटी क्यों नहीं चहिये ?
फोटो (इंटरनेट )






